Friday, 24 February 2017

Jageshwar Temple, Almora

               शिवरात्रि के अवसर पर भोलेनाथ के मंदिरों का ध्यान आना स्वाभाविक है और यही मेरे साथ भी हो रहा है। रह रह कर अपने द्वारा देखे गये कुछ मंदिरो की बरबस याद आ रही है, तो कुछ देर पुराने फोटो देखने में व्यस्त हो गयी। अब जब लैपटॉप खुल ही गया है तो सोच रही हूँ अपने साथ साथ आप सभी को भी इस पावन अवसर पर जागेश्वर के दर्शन करा दूँ। तो चल पड़ते हैं इस छोटी सी पोस्ट के माध्यम से शिव जी के पास। अभी पिछले बरस घर मई में घर जाना हुआ तो जोगेश्वर भी गये। दस मई २०१६ को घर पहुंचे,उसी दिन भाई भी रानीखेत से आ गया। हमारी इस  ट्रिप का मुख्य उद्देश्य जागेश्वर जाना ही था क्योंकि किसी पंडित ने वहाँ पर कालसर्प योग के निवारण की पूजा करवाने को कहा था। इस तरह से ११ मई २०१६ की सुबह हम तैयार हो कर जागेश्वर चल पड़े।
         अल्मोड़ा से चौतीस किलोमीटर दूर इस धाम को भगवान् शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि देवदार के घने जंगलों में भोलेनाथ नागेश्वर के रूप में विराजमान है। जागेश्वर जाने के लिये हम अपने घर से लक्ष्मेश्वर की तरफ आगे बढे। यहाँ पर बाई पास में डाइवर्जन मिलता है। नीचे को जाने वाली रोड रानीखेत पहुंचाती है और दूसरी रोड जिसे अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ रोड कहा जाता है हम उस रोड पर आगे बढ़ गये। करीब तीस किलोमीटर तक जाने के बाद हम आरतोला नाम की जगह पहुँच गये। अब बस महादेव हमसे ज्यादा दूर नहीं थे। यहाँ पर फिर से एक डाइवर्जन मिला और हम अपनी मंजिल की और नीचे जाने वाली सड़क पर आगे बढ़ गये। अगर सीधे सीधे आगे बढ़ जाते तो हम पनुवनौला पहुँच जाते। खैर हम तो जागेश्वर जा रहे थे ओर वहीँ जाने वाली सड़क में आगे बढ़ रहे थे। ये रोड पहले जितनी अच्छी तो नहीं थी लेकिन किसी भी एंगल से बुरी भी नहीं थी मतलब सड़क के दोनों तरफ देवदार के जंगल नजर आ रहे थे। सच में बहुत आनन्ददायक द्रश्य था। रुकने का बहुत मन था लेकिन अभी हमारा उद्देश्य पहले कालसर्प योग का निवारण करवाना था तो हम आगे बढ़ गये। अब तक मौसम में ठंडक आ गयी थी, इसका कारण आस पास में देवदार के जंगल का होना था।
               वैसे मई के महीने के महीने में ठंडक कहना उचित नहीं लग रहा, मौसम सुहावना हो रहा था कहूँ तो ज्यादा अच्छा लगेगा। तो इस सुहावने मौसम के मजे लेते हुये हम मंदिर परिसर के पास पहुँच गये। इससे पहले जब भी हम जागेश्वर आये थे तो यहाँ पंडितों की थोड़ा मनमानी सी चलती थी लेकिन अब थोड़ा व्यवस्था में सुधार हो गया है। अब मंदिर के गेट के समीप जिसे जिस प्रकार की पूजा करानी हो उसकी पर्ची कटवा देते हैं और पूजा अर्चना के बाद पंडितों को कुछ देना आवश्यक नहीं है। यदि आप देना चाहें तो कोई हर्ज नहीं हुआ,अपनी अपनी श्रद्धा के हिसाब से दे सकते हैं कोई मना नहीं करेगा। अपनी पर्ची कटवा के हम सर्वप्रथम दर्शन के लिये पंक्ति में लग गये और उसके बाद पूजा अर्चना के लिये मंदिर चल पड़े। मंदिर जाने के कर्म में सबसे पहले महामृत्युंजय के दर्शन करे, वहीँ पर पंडित जी ने पाठ कराया, इसके बाद चाँदी का नाग नागिन का जोड़ा दे कर कहा इसे गंगा में प्रवाहित कर देना। अब मैं सोच में पद गयी कि इतनी जल्दी हम हरिद्वार कैसे जा पायेंगे पर उसी समय उन्होंने शंका का निवारण कर दिया नीचे जटा गंगा में जा कर प्रवाहित कर आओ, जल्दी से पंडित जी ने वहाँ  जा के आने को बोला और इसीके साथ हिदायत दे डाली कि प्रवाहित करने के बाद ना वहाँ रुकना और ना ही पीछे पलट कर देखना। इतने को पूजा पाठ के मामले में हम भी थोड़ा डरपोक ही हुये  झट गये और पट वापस आ गये। महाम्रत्युन्जय मंदिर के बारे में ये माना जाता है कि इसे आजादी गुरु शंकराचार्य ने कीलित कर रखा है, इस वजह से यहाँ यदि कोई किसी के बुरे के लिये कामना करे तो वो फलीफूत नहीं होती। इसके बाद पंडित जी ने कर्म से नागेश्वर के दर्शन कराये फिर मंदिर समूह का चक्कर लगा कर हम चल पड़े वापस घर।
जागेश्वर मन्दिर दर्शन के समय के कुछ  द्रश्य-

देवदार के पेड़ों के मध्य मंदिर समूह। 

ॐ नागेश्वराय नमः। 

महामर्त्युन्ज्य, ये ही सबके तारणहार हैं। 
यही है जटा गँगा। 
पतित पावनी गँगा और पार्श्व में धन के देवता कुबेर का मंदिर। 

देवदार के जंगल। 
पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित दंडेश्वर मंदिर। 

मंदिर के बाहर लगी दुकाने। 

Saturday, 4 February 2017

Rishikonda Beach and Kailshgiri Hill,Visakhapatnam

         चलिये हमारे साथ एक देश जिसके कण कण में श्रद्धा और भक्ति रची बसी हुयी है। शायद अब तक सब समझ ही गये होंगे कि मैं कहाँ की बात कर रही हूँ। जी हाँ इस यात्रा में आप हमारे साथ चल रहे हैं पुराने उत्कल मतलब आज का उड़ीसा। ये यात्रा हमारे लिये थोड़ा आश्चर्यजनक रही क्योंकि हम अभी तक उत्तराखंड के बाहर किसी मंदिर या तीर्थ स्थल के दर्शन के लिये नहीं पहुंचे हैं,और ना ही कभी जाने का कार्यक्रम बनाया।  हमारे यात्रा भ्रमण में प्राकृतिक स्थलों और समुद्री किनारों की अधिकता रही है। इसलिये  शायद भगवान जग्गनाथ ने ही हमें स्वयं दर्शन देने के लिये बुलाने की इच्छा रखी होगी और हम भी हो आतुर हो गये उनके धाम जाने को।

Friday, 27 January 2017

Pine Tree shooting Point and Paykara


              अभी आँखों से अपर भवानी झील की खुमारी उतरी भी नहीं है और आगे बढ़ने का समय भी आ गया । घबराइए मत कुछ नहीं हुआ मेरे कहने का मतलब है कि चंदा मामा छुप गए है और सूरज चाचू नया सवेरा ले कर सामने आ गये। उठो उठो!!,अपना सामन समेटो और आगे बढ़ो। अरे हाँ आज तो हमें बैंगलोर वापसी भी करनी है, तो बाहर निकलते हुये होटल को बाय-बाय करना होगा। ठीक है जी कर देते हैं ये काम भी, अपना बोरिया बिस्तरा ले कर हम चेक-आउट करके बाहर निकल गये।
                सोच रहे हैं आज ऊटी में ही पेट पूजा कर के निकलते हैं फिर रास्ते में बार बार रुकने का झंझट नहीं रहेगा। ठीक सवा आठ में हम एक शुद्ध शाकाहारी रेस्टॉरेंट में जम गये और जमकर खाने के बाद फाइनली नौ बजे ऊटी को अलविदा बोल ही दिया। इस बार हमारा मन लंबे रास्ते से होकर गुजरने का है।बहुत देख लिये हेयर पिन बैंड , अब कहीं और छापा मारते हैं। ठीक है जी तय हो गया इस बार हम शूटिंग पॉइंट में पिक्चर बनायेंगे और बैंगलोर जा के यूट्यूब में पिक्चर रिलीज करवायेंगे। सो रास्ते का मैप कुछ ऐसा बना कि ऊटी से शूटिंग पॉइंट और वहाँ से पयकारा झील में बोटिंग कर के आगे बढ़ेंगे। इस बार का ऊटी ट्रिप में झीलों का योगदान काफी ज्यादा हो रहा है। कोई ना कभी कभी होता है जल से जीवन है और झीलों से हम हैं।
शूटिंग पॉइंट का सरप्राइज।

Tuesday, 24 January 2017

Upper Bhavani Lake,Ooty

             आज के दिन का ऊटी भ्रमण कुछ अलग सा ही रहा या क्योंकि आज के दिन सुबह उठने तक भी ये अंदाजा नहीं हो रहा था कि जाना कहाँ है। खैर ट्रिप एडवाइजर में नजर डाली तो एक झील पे जा के दिमाग अटका। झील का नाम था अवलांची लेक और लोगों से गजब की तारीफ पायी थी इसने तो जिसे देखो उसने यही लिखा था मेमराइजिंग,अमेज़िंग तो सोचा एक बार देख ही आते हैं इस जगह को। होटल वाले से बात करी तो वो झील के नाम पर मुंह सा बनाने लगा। हम हुये धुन के पक्के जब मन में ठान लिया जाने का तो जा के रहेंगे। गूगल मैप में लोकेशन डाली तो पता लगा कि तेईस किलोमीटर दूर है और हम निकल पड़े इस एक तरह से छुपी हुई इस अवलांची झील से साक्षात्कार करने के लिये।
ये ही है वो जगह। 

Thursday, 5 January 2017

Once Again in Ooty

           एक बार फिर से मन में घुमक्कड़ी का किला कुलबुलाने लगा था। वैसे इस समय घूमने निकलने का मुख्य कारण घर वालों की बैंगलोर में उपस्थति भी थी। अब वो लोग नार्थ से साउथ आये हुये हैं तो उन्हें कहीं ना कहीं ले जाना तो बनता ही है। जब जाने का तय कर ही लिया तो निकलना तो हुआ ही और मन में सोच लिया कि चलो ऊटी ही चले जाते हैं। हम तो पांच साल पहले भी एक बार ऊटी गये थे तो हमारे लिये तो यहाँ जाने का उतना आकर्षण नहीं था लेकिन दूर से आने वालों के ऊटी के जानी मानी जगह ही हुयी।
Travel date-17th December 2016
            बैंगलोर से ऊटी तीन सौ किलोमीटर की दूरी पर है और जाने के दो रास्ते है। पहले रास्ते में छत्तीस हेयरपिन बैंड मिलते हैं। इस रास्ते हम पहले भी गये हुये थे और अभी भी हमें इसी रास्ते जाना था। दूसरा रास्ता थोड़ा लंबा है जिसमे अस्सी किलोमीटर और जुड़ जाता है लेकिन ये रास्ता आने जाने के लिये थोड़ा आसान है और इसमें पहाड़ी रास्ता कम हो जाता है। इस रास्ते में दो तीन आकर्षण पड़ते हैं, पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के हिसाब से  इन जगहों को देखते हुये हम लम्बे रास्ते के मजे लेते हुये बैंगलोर वापस आ जाएंगे। मतलब अपनी प्लानिंग तो हो गयी आने की भी और जाने की भी। सक्लेशपुर वाली यात्रा के समय से हम थोड़ा लेट लतीफ़ साबित हो रहे हैं। फाइनली सुबह साढ़े सात बजे हम ऊटी जाने के लिये निकल पड़े। नौ बजे हम मेददुर पर थे जहाँ होटल नंदी कैफ़े में हम लोगों ने चाय नाश्ता किया। मैसूर में शहर के अंदर से हो कर जाना मतलब बेफालतू के जाम में फंसना हुआ और अपना तो वहाँ जाने का कोई काम भी नहीं हुआ तो हम मैसूर बाय पास रोड पकड़ कर ऊटी के रास्ते में आगे बढे। पाँच साल पहले जब आये थे तब से रोड की हालत में बहुत अंतर लगा। कई जगह तो टॉल प्लाजा का निर्माण ऑलमोस्ट हो गया था लेकिन पैसे लेने की दुकान अभी स्थापित नहीं हुयी थी। चलते चलते हम अब बांदीपुर के जंगल तक पहुँच गये। शायद मौसम की मार ही होगी जो अबकि यहाँ का जंगल हरे भरे की जगह सुनसान लग  रहा था। ये सोच के चौकना मत कि जंगल है तो सुनसान तो लगेगा ही। मेरे कहने का मतलब है कि हरियाली बहुत कम थी तो जंगल भी जंगल  जैसा नही लग रहा था। जानवरों के नाम पर भी इस बार एक दो हिरन और एक हाथी के बच्चे को छोड़कर कुछ नहीं दिखा। अरे हाँ बन्दर भी देखे थे लेकिन अब बंदरों को कहाँ जंगल का बाशिंदा माने वो तो बीच शहर में भी नजर आ ही जाते हैं। इसके बाद बांदीपुर का जंगल पार कर के मदुमलाई के जंगल में आ गये। नाम तो बदल गया लेकिन जंगल का स्वरूप वो ही रहा। खैर ये तो हुयी मजाक की बातें, जंगल तो जंगल ही हुआ। कौन जाने कब कौन सा जानवर मिल जाये। वो भी तब जब जगह जगह चेतावनी लिखी हों कि गाड़ी से बाहर ना उतरे और तो और शाम छह बजे से इस रास्ते पर आवागमन बंद हो जाता है। अब हम गुंडूलपेट पहुँच गये हैं, यहाँ से ऊटी जाने के दो रास्ते हैं पहला वो जिसमे छत्तीस हेयरपिन बैंड पड़ते हैं, हम पहले भी इसी रास्ते गये थे और अभी भी इसी रास्ते जा रहे हैं क्योंकि ये रास्ता थोड़ा छोटा पड़ता है और असल पहाड़ी रास्ते जैसा आनन्द भी दे जाता है वैसे दूसरा रास्ता जब अभी देखा ही नहीं तो उसका क्या कह सकते हैं। एक दो तीन गिनती करते हुये पूरे छत्तीस के छत्तीस मोड़ पार हो गये और हम पहुँच गये लाल मिटटी के देश ऊटी की वादियों में। जल्दी जल्दी हम पहले से बुक कराये हुये होटल में पहुंचे और पहुँचते के साथ ही घर से लाये पराठों का भोग लगा लिया। पेट पूजा में ज्यादा समय व्यतीत ना कर के हम घूमने निकलने के मूड में थे जिससे ज्यादा से ज्यादा देख पायें।
          ऊटी में सबसे पहले हम बोटोनिकल गार्डन पहुंचे, पर इस बार ये पहले के जितना आकर्षित नहीं कर पाया। फूलों की कमी बहुत ज्यादा खल रही थी। मौसम मौसम की बात होती है जब हम जुलाई में आये थे तो यहाँ की छटा बहुत निराली लग रही थी। फटाफट यहाँ का एक राउंड मारा और हम आज के अगले पड़ाव वैक्स म्यूजियम चले गये। अरे ये क्या ये जगह तो एकदम ही अलग लग रही है देख के ऐसा लगा ही नहीं जैसे हम पहले भी कभी आये हों।
          पहले टिकट ले कर अंदर के नज़ारे देख लेते हैं। अन्दर तो गांधी जी, मौनी बाबा, वीरप्पन और एक शराबी की बढ़िया नक़ल बनायी हुयी हैं। मुझे लगा था ये जगह बेटी को पसंद आएगी लेकिन उसे तो ये फूटी आँख भी नहीं सुहाया और हम आगे बढ़ गये। यहाँ से बाहर की रौनक तो देखते ही बन रही है। बड़े बड़े झूले लगे हुये हैं जो कि बच्चों के लिये मजेदार बन पड़े हैं और छोटे छोटे अर्टिफिसियल पानी के भंडार गृह जैसे हैं जिनमे बच्चों के लिये बोटिंग और बड़ों के लिये जोर्बिंग का प्रबंध है। बेटी को इन लोगों के पास छोड़ कर हम दोनों जोर्बिंग वाली सफ़ेद बॉल के अंदर चले गये। कुल मिलाकर इतनी बड़ी बाल के अंदर जाना और उसमें गोल गोल घूमने में बहुत मजा आया। अब तक अँधेरा गहरा गया और मौसम में ठंडक भी आ गयी और हम अपने होटल में जा पहुंचे।इस होटल में खाने का कोई इंतजाम नहीं था और इस ठण्ड के मौसम में हम बाहर निकलने की हिम्मत भी नहीं कर पाये, इसलिए होटल के मैनजेर से बात कर के हमने यहीं खाना मंगवा लिया। तमिलनाडु केरल जैसी जगहों में शाकाहारी लोगों के लिए ज्यादा विकल्प नहीं रहते इसलिये मन मार के जो मिला वो ही खा लिया। 
इस यात्रा के कुछ द्रश्य-
ये रास्ते अक्सर मंजिल से बेहतर क्यों होते हैं?

भले कैसी भी जगह हो गाय अपना चरना थोड़ी ही छोड़ देगी।
मेरा भारत महान। 
एक बार फिर बोटैनिकल गार्डन में ,इन पाँच सालों में बहुत कुछ बदल गया। 



ऊटी की लाल मिटटी बड़ी सुन्दर लग रही थी। 

इस बार फूलों की जगह बस हरी घास के मैदान नजर आये। 

अंग्रेजो के ज़माने की बिल्डिंग लगती है। 

गाँधी जी। 

ममतामयी माँ 

अब्दुल कलाम, उतना सजीव नहीं लग रहा ना। 

वीरप्पन की गुफा। 
एक्सीडेंट हो गया। 



वैक्स म्यूजियम के झूले। 
मजा आ गया जॉर्बिंग कर के। 
इस यात्रा की समस्त कड़ियाँ -

Monday, 5 December 2016

Sakleshpur, The Green Land

             बोनस के रूप में मिले चिकमंगलूर के बाद फाइनली आज हम सकलेशपुर की सैर पर निकलने वाले थे। पहले दिन से बहुत थके होने के कारण सुबह आँख देर से ही खुल पायी। फिर सोचा दिनभर काफी घूमना है तो ब्रेकफास्ट होटल से ही करके चलते हैं जिससे फिर खाना मिले ना मिले तो कोई टेंशन ना रहे। इस समय साथ में एक ही जगह तीन छोटे बच्चे थे तो टाइम ज्यादा लगना अवश्यम्भावी था। इसलिए हम अच्छे से खा पीकर नौ बजे होटल से निकले। दोनों गाड़ियाँ एक दूसरे का साथ निभाते हुये आगे बढ़ रही थी।

Friday, 2 December 2016

Chikmaglur: Land Of Coffee

 Travel date-9th October 2016      
        दक्षिण भारत के इन प्रसिद्ध मंदिरों की स्थापत्य कला के दर्शन करते करते दोपहर हो गयी थी। अब तक सूर्य भगवान शायद क्रुद्ध  अवस्था में आ चुके थे और बड़े बड़े पत्थरों से शोभायमान आँगन इतना तप गया था कि पैर जमीन पर रखना मुश्किल हो गया। जल्दी जल्दी इस गर्म प्रदेश से से हम चिकमगलूर के लिए रवाना हुए, वैसे जल्दी भी क्या कहा जाये बारह तो बज ही गया था। साउथ में बहुत हिल स्टेशन हैं लेकिन उत्तराखंड के निवासियों के लिए यहाँ के हिल स्टेशन उतना अधिक आकर्षण वाले नहीं होते हैं, अभी तक तो यही लग रहा था  कि बस जाना है किसी पहाड़ी जगह।