Monday, 26 March 2018

Munnar: The Heaven

           समर वेकेशन आते आते बच्चों के साथ साथ बड़ों के मन मे ये सवाल उमड़ घुमड़ कर आने लगता है कि अबकी बार कौन से हिल स्टेशन के द्वार!! अपने भारत मे तो ना जाने कितने ऐसे शहर हैं जहां जा कर झुलसाने वाली गर्मियों से बचते हुये सुकून से चंद दिन गुजारे जा सकते हैं!! हिल स्टेशन का नाम ले तो समझ ही नही आता कहाँ से शुरू किया जाये!! बहुत सी जगहों के नाम तो आप इस ब्लॉग के जरिये जान ही गये होंगे!! पहाड़ में घर होने के कारण पहाड़ो के साथ चोली दामन का साथ रहा है मेरा!! कभी उत्तर भारत की हिमालय श्रंखला में मन रमा रहता था तो अब बैंगलोर में दाना पानी होने से पश्चिमी घाट अपना सा लगता है!!


Monday, 12 February 2018

Kotilingeshwar Temple,Kolar

                        कोटिलिंगेश्वर जहाँ महाकाल विराजते हैं अपने महा विशाल रूप में   
              कोटिलिंगेश्वर, एक ऐसी जगह जहां भोले भंडारी एक सौ आठ फ़ीट के विशाल अवतार में विराजमान हैं। वैसे तो भारत मे महादेव के अनेक मंदिर हैं और हर मंदिर में वो एक अलग रूप में धूनी रमाते हैं पर कर्नाटक के कोलार जिले में एक ऐसा मंदिर है जहाँ कदम रखते ही अपार शिव शक्ति का आभास दूर से ही हो जाता है।
            बंगलोर से सत्तर किलोमीटर दूर कोलार, वो ही कोलार जिसे सब सोने की खानों के लिए जानते हैं अपने आप मे एक बहुत बड़ा आश्चर्य समेटे हुये है। यहाँ पर एक ऐसा मंदिर है जिसमे दुनिया का सबसे ऊंचा शिवलिंग जिसकी ऊंचाई एक सौ आठ फ़ीट है। इसके अतिरिक्त यहाँ पर छोटे बड़े सब शिवलिंगों की अगर गिनती कर ले तो वो करीबन एक करोड़ निकलेंगे। एक करोड़ शिवलिंग होने के कारण ही इसे कोटिलिंगेश्वर के नाम से जाना जाता है।

Monday, 13 November 2017

Dhauli Shanti Stupa and Pipli

             यूँ तो सूरज की किरणें हर रोज एक नये सवेरे की चमक दमक से इस धरा को सराबोर करती हैं लेकिन ये सुबह तो कुछ अलग ही लग रही हैं। सारा का सारा शहर आध्यात्म के रंग में रंगा हुआ और सब लोग आध्यात्मिक रस से ओतप्रोत लग रहे हैं!! ऐसा होना स्वाभाविक ही है , अब उड़ीसा की राजधानी भुबनेश्वर आ कर ये अनुभूति ना हो तो और कहाँ होगी!! हमारे होटल में सुबह सात बजे से कॉम्प्लिमेंट्री ब्रेकफास्ट मिलना शुरू हो रहा है तो जल्दी जल्दी तैयार हो कर रेस्तरां ही पहुँच जाते हैं !! आज जल्दी जल्दी करना थोड़ा जरुरी भी है क्यूंकि आज के दिन में बहुत कुछ देखना है और बहुत कुछ जानना भी है अगर यहीं से देर कर दी तो अपनी देखने वाली जगहें छूट जाएँगी !! ये शायद घुमक्क्ड़ी का कीड़ा ही है जो एक बार किसी को काट ले तो फिर फिर वो बेचारा कहीं चैन से नहीं रह सकता !! बेचारे का दिन का चैन और रात की नींद तो गायब  होनी तय है !! ये ही लाइलाज बीमारी अपने को भी लग गयी है तो बस अब तो जिंदगी इसके साथ निकलनी है !!

Monday, 6 November 2017

Nandan Kanan Zoo,Odisha

          बड़ी गरम जगह है यार ये उड़ीसा!! जनवरी के महीने में ये चिलचिलाती धूप और चिपचिपी वाला पसीना होता है तो ना जाने गर्मियों में क्या हाल होता होगा!! उस पर उदयगिरि की सीढ़ियों में चढ़ाना ये तो वो ही हाल हुआ करेला उस पर नीम चढ़ा हुआ!! अरे अब मैं ये सब क्यों सोच रही हूं अब तो हम लगभग इन सीढ़ियों से उतर कर सड़क पर ही आ पहुंचे हैं!! नारियल पानी वाले दिख रहे हैं पास में ही, एक एक नारियल ले कर थोड़ा गला तर कर लेते हैं और धूप से बचने को गाड़ी में ही जा के बैठ जाते हैं!! अब तो मन कर रहा किसी छांव वाली जगह बैठकर आराम मिल जाये तो अब चलते हैं वृक्षों से आच्छादित और वन्य जीवों के आवास नंदन कानन!! नारियल पानी पीते पीते अब हम सड़क पर चलते जा रहे हैं और वाइट टाइगर से साक्षात्कार की उम्मीद लिए नंदन कानन जो कि यहां से अट्ठारह किलोमीटर दूर है उसकी तरफ आगे बढ़ते जा रहे हैं!! बहुत नाम सुना है इसका जहाँ ये दिखता है वो दिखता ना जाने क्या क्या!! मुझे तो नाम भी याद नही रहते अब क्या कहूँ!! खैर बाते तो होती ही रहेगी अब एक छोटा सा परिचय दे देते हैं!!

Tuesday, 26 September 2017

Syahi Devi Shitlakhet, Almora

              नवरात्रि के पांच दिन गुजर गये और मैं आज तक आपको किसी भी माता रानी के दर्शन कराने नहीं ले गयी। अब तो मुझे खुद भी लग रहा है ,बेटा बहुत अलसा लिये !! डांडिया गरबा में इतना रमना भी ठीक नहीं !! कम से कम इन नौ दिनों में से एक दिन तो किसी मंदिर को याद कर ले!! जा नही सके तो फोटो ही देख लो और बाकियों को भी दिखा तो !! तो चलिये आज अपना आलस छोड़ कर आपको ले चलते हैं माता के दरबार में !!देवी माँ के नौ रूप हैं और अलग अलग जगह वो अलग अलग रूप में विराजती हैं कहीं देवी भगवती  के रूप में तो कहीं माँ कालिका के रूप में!! देवों की नगरी यानिकि देवभूमि उत्तराखंड में बसने वाली स्याही देवी के सानिध्य में।

Friday, 1 September 2017

Udaygiri and Khandgiri Hills,Bhubneshwar

           भारत की पूरब दिशा में बसा से उड़ीसा राज्य हर तरह से समद्ध है चाहें वो धार्मिक दृष्टि से हो या फिर प्राकृतिक दृष्टि से। चार धामों से से एक जगन्नाथ पुरी भी यहीं है और राजधानी भुबनेश्वर में लिंगराज जैसा विख्यात मंदिर भी यहीं है। इसकी धार्मिक समर्द्धता के विषय मे ज्यादा कुछ कहने की आवश्यकता ही नही है वो यहां के प्रतीक चिन्हों से अपने आप झलकने लगती है!! यहाँ ना केवल हिन्दू धर्म स्थल हैं अपितु जैन और बौद्ध धर्म के भी प्रतीक चिन्ह उपस्थित हैं!!  इसी क्रम में यहाँ के कुछ मंदिर दर्शन के तदोपरांत हम लोग उदयगिरि और खंडगिरि से रूबरू होने के लिये आगे चल पड़े। लिंगराज मंदिर से यहाँ की दूरी करीब आठ किलोमीटर की है ओर हम आधे घंटे में इन गुफाओं के प्रवेश द्वार तक पहुंच गये!! यहाँ भी सभी पर्यटक स्थलों की तरह जगह जगह पार्किंग के नाम पर पैसा वसूलने वाले लोग विराजमान है और चालीस रुपये के रूप में हमसे भी वो अपनी फीस झटक ले गये!! खैर अब घूमने निकले ही हैं तो इतना तो करना ही पड़ेगा।
         बहुत देर से उदयगिरि खंडगिरि का जाप लगा रखा है ना!! चलिये अब एक छोटा सा परिचय भी दे डालती हूँ, बिना परिचय के यात्रा वर्त्तान्त में आंनद नही आ पाता है!! उदयगिरि और खंडगिरि दोनों आमने सामने स्थित दो पहाड़ियाँ है जिनमे छोटी बडी गुफाएं बनी हुई हैं। ये गुफाएं प्राकृतिक और मानव निर्मित दोनों का संगम हैं।
      जैसा कि नाम से ही पता लगा रहा है उदयगिरि से तात्पर्य है उगते सूरज की पहाड़ी और खंडगिरि का अभिप्राय अवशेषो से है!! एक ही दिन में दोनों पहाड़ियों में चढ़ना तो जम नही  रहा तो दोनो में से एक का चयन जरूरी है तो हम भी उदयगिरि की गुफायें देखने का तय किया!! उदयगिरि में छोटी बड़ी पंद्रह और खंडगिरि में अट्ठारह गुफाएं है !! चलिये हल्का फुल्का परिचय तो हो गया अब उदयगिरि की गुफाओं के दर्शन भी कर लेते हैं!! नीचे से ऊपर तक गुफायें ही गुफायें बनी हुयी है और इन को देखने के लिये सीढियां चढ़ना जरूरी है!! जो एक बार सीढियां चढ़ना शुरू करे तो सभी गुफायें क्रम से नजर आ ही जाती हैं। कुछ गुफाएं दुमंजिली जैसी भी लग रही है तो कुछ एक मंजिली ही हैं!! लेकिन उनकी ऊंचाई इतनी नही लग रही कि उनके अन्दर आराम से खड़ा हुआ जा सके। अब पुराने समय मे भी आदमी की लंबाई इतना कम तो नही रही होगी कि इतनी सी गुफा में समा जाये, इसका मतलब है कि ये लोग गुफा के अंदर झुककर प्रवेश करते होंगे और इनका उपयोग बैठने  या सोने के लिये ही करते होंगे!! सच मे छोटे छोटे कोठे जैसे बने हुये हैं!! अरे हाँ याद आया अंडमान के काला पानी , अरे यार वो ही सेलुलर जेल की कोठरियों का जैसा आकार है इनका भी। ना कोई खिड़की ना कुछ!! बस अंतर इतना है कि इनमे दरवाजा नही है और यहाँ खुली हवा और प्रकाश बेखटके आ सकता है तो जैन साधक भी एक दूसरे से मिलने जरूर आते ही होंगे!! कुछ लोग बता रहे थे कि इनका निर्माण कुछ इस तरह से किया गया है जिससे दिन में सूर्य देव अपनी  कृपा बरसाते रहें और रात में चाँद की चांदनी से भरपूर रोशनी होती रही!! पुराने लोग बडा ही दिमाग लगाते थे इन सब चीजों में, इनके सामने तो आज के बड़े बड़े आर्किटेक्ट भी फेल हो जायें!!
       एक समय रहा होगा जब ये जगह जैन साधुओं से गुलजार रहा करती होगी लेकिन अब तो यहाँ बंदरों और आजकल के लव बर्ड्स का डेरा लगा रहता है!! ठीक ही बात है समय बदलते क्या देर लगती है😀😀। गुफाओ के मुख्य द्वार पर कुछ कुछ अलंकरण से बने हुये हैं जो कि समय के साथ साथ धूमिल होते जा रहे हैं!! सामने से खण्डगिरि की पहाड़ियों पर बने मंदिर के दर्शन हो रहे हैं, अब वहाँ जाना तो संभव नही है सो यहीं से हाथ जोड़ लेते हैं!! अब थोड़ा मलाल सा लग रहा है कि काश पहले इन्हीं पहाड़ियों में चले गये होते तो मंदिर भी जाया जा सकता था। यहीं से मंदिर के साथ साथ भुबनेश्वर शहर का भी अवलोकन हो जा रहा है। सीढियाँ चढ़ते चढ़ते थोड़ा थकन तो हो ही जाती है तो इसका भी उपाय यहाँ पर है !! बैठने के लिये भरपूर मात्रा में गोल गोल वाले पत्थर है जो कि लगभग सभी गुफा के समीप वाली जगहों पर मिल जाते हैं !! दायें-बायें जाने के लिए सीधे समतल रास्ते बने हुये हैं जिनमे दोनों तरफ पेड़ों की छावं मिलने से अच्छा लगता है और साथ में गुलाबी रंग के खूब सारे कागजी फूल भी अपनी छटा बिखरते हुये मिल जायेंगे !! यहाँ पर कुछ लड़के हमारे आगे आगे जा रहे थे तो हम भी उनके पीछे हो लिये कि शायद ये कोई व्यू पॉइंट देखने जा रहे होंगे लेकिन थोड़ी ही देर में वो ना जाने क्या सोच क्र जंगल में उतर गए और हम वापस अपने रास्ते पर !! यूँही बिना सोचे किसी के पीछे लगने से कई बार ऐसा हो जाता है !! अब  वाले रास्ते में पहुंचे तो वहाँ बंदरों की फौज जमा थी !! बानर सेना   बंदरों से बचते बचाते किसी तरह अपने कैमरा का प्रयोग करते हुये अब हम नीचे उतर रहे हैं।  हम नीचे उतरते उतरते फ़ोटो लेते गये और आप देखते जाइये !! नीचे उतरने के बाद भूख प्यास सब अपना जोर लगाने लगी है तो एक एक नारियल पानी हम तीनो ने ले  लिया और उसे पीते पीते ही पार्किंग स्थल में जा पहुंचे !! उदयगिरि की पहाड़ियों के बाद हम हमारा अगला पड़ाव नन्दन कानन है तो अगली पोस्ट में मिलते हैं नन्दन कानन की जैव सम्पदा के विस्तार पूर्वक वर्णन के साथ और तब तक आप लोग उदयगिरि की इन पंद्रह गुफाओं के चलचित्र देखिये-

छोटी छोटी गुफायें 
ये सीढियाँ भी गुफानुमा पत्थरों को काट कर बनायीं गयी हैं। 



बलुवे भूरे रंग की गुफाओं के बीच धानी रंग अदभुत लग रहा था !!

इनके प्रवेश द्वार पर कुछ अलंकरण बनाये गये हैं जो कि समय के साथ धूमिल से हो रहे हैं !!

खंडगिरि की पहाड़ियों पर बना सफ़ेद मंदिर , बढ़िया दृश्य था बहुत। 

भुबनेश्वर की कुछ इमारतें   
गुफायें  ही गुफायें 
कुछ हद तक तो ये ऐसे लग रहे हैं जैसे किसी बरामदे में छत को स्पोर्ट देने के लिये स्तम्भ बनाये हों !!
ये ही वो लड़के थे !!


धूप के बाद छाँव बहुत अच्छी लगती है !!

Friday, 4 August 2017

Lingaraj temple-Landmark of Bhubaneswar

 Travel Date- 19th January 2017
           विशाखटपटनम से जो ट्रैन में बैठे तो सीधे भुबनेश्वर के पास ही नींद खुली। अभी चाय वाला चाय गरम,चाय गरम करने लगा तो हम भी चाय की चुस्कियों का स्वाद लेने को आतुर हो गए। वैसे हम दोनों से ज्यादा सान्वी का मन हुआ क्यूंकि ट्रैन के सफर में जो कुछ खाने पीने को आता है उसे वो सब मंगाना होता है ☕, बाल हठ हुआ उसके आगे आजतक किसका जोर चला है। अब चाय आ ही गयी है तो चुस्की लगा ही लेते हैं। अब तक सहयात्रियों से हलकी फुलकी बात से उन लोगों को अंदाजा आ गया कि हम बैंगलोर से उड़ीसा घूमने के लिये आये हैं तो उन्होंने हमे जगन्नाथ पूरी का एक वीडियो दिखाया जिसमे वहाँ की विशेषताएं, भोजन बनाने के तरीके और झंडा बदलने का विधान शामिल था।  अब इसे देख कर पूरी जाने की उत्कण्ठा में चार गुना वृद्धि हो गयी। अलग अलग जगह के लोगों की बोली में कितना अंतर आ जाता है बताती हूँ!! हमारे पास वाली बर्थ  में दो लोग बैठकर बात कर रहे थे " आज खेला है ,तुम देखेगा  " दूसरा बोलता है "हम खेला नहीं देखते बस न्यूज़ में पता कर लेते हैं। " यहाँ इन लोगों का खेला से मतलब क्रिकेट मैच से है। यूँही लोगों की बातें सुनते हुए भुबनेश्वर का रेलवे स्टेशन आ गया और सहयात्रियों से विदा ले कर हम उतर गये।
           इस तरह से आज हम धार्मिक पर्यटन के लिए विख्यात उड़ीसा की राजधानी भुबनेश्वर की पावन धरती पर पहुँच गये। हमने पहले से देख कर ही रेलवे स्टेशन के नजदीक का होटल बुक करा रखा था तो पैदल ही वहां पहुँच गए। होटल में जा कर पता लगा कि आज यहाँ IPL का मैच है जिस वजह से सभी होटल बैक टू बैक भरे हुये हैं। पहले से बुकिंग के कारण हमको तो कोई दिक्क्त नहीं होनी थी पर थोड़ा थके होने के कारण अर्ली चेक इन का मन था पर इस मैच ने हमारे मंसूबों पर पानी फेर दिया।  अब समझ में आया ट्रैन वाले लोग इसी मैच को देखने की बात कर रहे थे। होटल देखने से खूब बढ़िया था, रिसेप्शन में बैठकर भी इसकी भव्यता स्पष्ट नजर आ रही थी। अब अपना नंबर भी आ ही गया , अरे ये क्या !! ये तो होटल में कमरा देने से पहले वेब केम ( web cam) में फोटो भी ले रहे हैं शायद सुरक्षा के हिसाब से लेते होंगे। इस तरह का ये अपना पहला अनुभव है तो आश्चर्यजनक लगा।  फोटो खींचते खिंचवाते हम अपने कमरे में दाखिल हो ही गये और कमरे में पहुँचते ही दो चाय, दो पराठे एवं  हैंडविच मतलब सैंडविच का आर्डर दे डाला। ये सब आने तक थोड़ा फ्रेश हो लेते हैं और पेट पूजा के बाद भुबनेश्वर के दर्शन को निकलेंगे।  तब तक आप लोगों को भुबनेश्वर का एक सूक्ष्म परिचय दे देते हैं।
भुबनेश्वर - भारत के पूरब और बंगाल की खाड़ी के मुहाने पर बसा ये शहर भुबनेश्वर  शिवजी को समर्पित है और उन्ही के नाम पर इसका नाम भुबनेश्वर पड़ा है। इतिहास में जायें तो समझ आता है कि  ये शहर मात्र शहर नहीं अपने में की रहस्य समेटे हुए बैठा है। अरे हाँ इसने तो कलिंग का युद्ध भी देखा है।  ऐसा भयंकर रक्तपात, खून की नदियों और शोक सन्तप्त लोगों का विलाप देख के इसका दिल कितना द्रवित हुआ होगा !! बहुत दर्द छुपा रखा है इसने अपने अंदर अंदर। इस बात की जितनी गहराई में उतरेंगे मन उतना ही द्रवित हो जायेगा इसलिये जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी बाहर निकल जाते हैं। अभी अभी मुझे याद आया पुराने समय में इसे "उत्कल" भी कहा कहा जाता था , जी हाँ वो ही  " पंजाब सिंध गुजरात मराठा द्रविड़ उत्कल बंगा " वाला उत्कल। इसका मतलब पुराने समय से ही बहुत प्रसिद्ध ह है ये जगह। कालांतर  में उड़ीसा के राजधानी बनने के बाद इस शहर का स्वरूप दोहरा हो गया , जहाँ एक तरफ इसके कण कण में ऐतिहासिकता बसी है वहीँ दूसरी तरफ इसकी हवाओं में आधुनिकता भी बहती है। इसके आधुनिक स्वरूप का निर्माण जर्मन वास्तुकार ओटो एच कोनिंग्सबर्गेस (Otto. H. Koeingsberges) ने करवाया था। 
              ऐसा माना जाता है कि पुराने समय में यहाँ पर सात हजार मंदिर थे जिसके कारण इसे मंदिरों का शहर के नाम से भी पहचाना जाता है। आज भी छोटे बड़े सात सौ मंदिर यहाँ पर हैं। इस शर को धार्मिक सद्भावना का शहर भी कह सकते हैं क्यूंकि यहाँ पर ना केवल हिन्दू धर्म अपितु बौद्ध और जैन धर्मावलम्बियों के मंदिर और अवशेष पाये जाते हैं। मुझे तो समझ ही नहीं आ रहा यहाँ क्या देखा जायेगा इतने कम समय में और कितना  कुछ रह जायेगा। एक बार यहाँ के दर्शनीय स्थलों पर भी एक नजर डाल लेते हैं। मंदिरो की भूमि होने से यहाँ हर दो कदम पर मंदिर दर्शन हो जाते हैं। लिंगराज का मंदिर, मुक्तेश्वर मंदिर, राजा रानी का मंदिर यहाँ के प्रमुख धार्मिक स्थल हैं। इन सबके अतिरिक्त उदयगिरि-खण्डगिरि की गुफाएँ, धौली स्तूप और नन्दन कानन यहाँ की प्रसिद्धि में चार गुना बढोत्तरी कर देते हैं। यहाँ का मौसम सालभर गर्म ही बना रहता है तो घूमने के लिए दिसम्बर-जनवरी के महीने उम्दा रहते हैं। लो जी परिचय देते देते अपना नाश्ता निपट गया और अपना टेक्सी वाला भी होटल के बाहर प्रतीक्षा में है तो अब आगे आंखों देखा हाल सुनिये।
         सुबह के ग्यारह बजे हैं 😀, सुबह क्या भरी दोपहरी ही हो गयी है और अब हम निकल पड़े भुबनेश्वर दर्शन के लिये। हमारा पहला पड़ाव लिंगराज मंदिर है जो कि हमारे होटल से पांच किलोमीटर की दूरी पर है इसलिए यहाँ पहुँचने में ज्यादा समय नहीं लगा। मन्दिर में फ़ोन, कैमरा और चमड़े का सामान ले जाने की अनुमति नहीं है तो ड्राइवर के कहे हिसाब से हमने ये सामान गाड़ी में ही छोड़ दिया और नंगे पैर ही चल पड़े। गर्मी ज्यादा होने से पैर जल भी रहे थे पर लोग तो कहाँ कहाँ से नंगे पैर चल कर दर्शन के लिये जाते हैं हमें तो बस पांच कदम ही चलना है।  अभी मंदिर के मुख्य द्वार पर पहुंचे ही थे कि एक पंडा जी मिल गये और बोलने लगे पचास रूपये में दर्शन करवा देंगे , उनसे ज्यादा किचकिच ना कर के हम उनके पीछे हो लिये। पंडा जी हमको समझाते हुये ले गए की अंदर किसी से ज्यादा बात ना करना सीधे सीधे जाना और वापस आ जाना और सबसे पहले वो हमको ले गये यहाँ की रसोई में  और वहां के खाना बनाने के तोर तरीके बताने लगे। यहाँ भी एक एक ऊपर एक सात मिटटी के बर्तन चूल्हे पर चढ़ाये जाते हैं और सबसे पहले सबसे ऊपर वाले में खाना बनता है। कैमरा तो ले जा नहीं सकते थे तो फोटो नहीं हैं दिखाने को।  इसके बाद अब हम मंदिर दर्शन की बारी आयी और पंडा जी ने हमको लाइन में लगवा दिया। धीरे धीरे कर के हम ठीक प्रतिमा के पास पहुँच गये। अब वहां खड़े एक पंडे ने  एक फूल हाथ में पकड़ा  दिया और अब वो महाराज संकल्प कराने लगे हमारे बिना कुछ कहे !! हम दोनों को इस तरह का कोई खास अनुभव पहले नहीं था तो मूक दर्शक बने खड़े रहे।  लास्ट में बोला अन्नदान की रसीद कटवा लो और पूछने पर जवाब आया कि पांच हजार से शुरू होता है तो हमने इंकार कर दिया कि हम एक पैसा नहीं देंगे और अब वो लगा अनाप सनाप बोलने !! तो हम वहां से वापस हो लिये तो बोला  मेरा फूल भी बर्बाद हो गया तो एक बार फिर पीछे प्लाट कर उसका फूल उसको वापस कर के हमने जान छुड़ाई। ये बात यहाँ बताने का मेरा आशय ये है कि जहाँ भी जाएँ अपनी श्रद्धा के हिसाब से दान पुण्य करें न कि पंडो के डर से ।  भगवान ने कभी ये नहीं कहा कि तुम पैसा नहीं चढ़ाओगे तो मैं ऐसा कर दूंगा या वैसा कर दूंगा!! ये इन पंडों  की अपने पेट पालन हेतु  बनाई हुयी परम्पराएं है जिनका पालन करने की बाध्यता किसी के लिये भी नहीं है। 

           अंत में ही सही लिंगराज मंदिर का इतिहास भी बता ही  देती हूँ। ये मंदिर भगवान शिव और विष्णु दोनों को समर्पित है।  यहाँ प्रतिमा का आधा हिस्सा शिवजी का तो ऊपर वाला भाग विष्णु भगवान के रूप में शालिग्राम जी का है।  इस कारण से इस मंदिर को हरीहर का मंदिर भी कहा जाता है।  यहाँ बेलपत्र के साथ साथ तुलसी के पत्ते भी चढ़ाये जाते हैं। विष्णु भगवान् एवं शिव जी दोनों का मंदिर होने के कारण इसके गुम्बद त्रिशूल और सुदर्शन चक्र की जगह में शिव धनुष बना हुआ है। मंदिर परिसर को चार हिस्सों में बांटा गया है - श्री मंदिर, जगमोहन, नाट मंडप एवम भोग मंडप। पहले यहाँ पर छोटे बड़े एक सौ आठ मंदिर थे जिनमे से अब पचास ही बचे  हैं। स्थपत्य की दृष्टि से ये मंदिर काफी समृद्ध है मंदिर के निचले भाग में एक मंच सा बना हुआ है जिसमें बहुत बारीकी से उस समय के समाज की दिनचर्चा को उकेरा गया है। 
        लिंगराज के बाद हम क्रम  से मुक्तेश्वर, सिद्धेस्वर और केदारगौरी इन तीन मदिरों में गये।  मुक्तेश्वर मन्दिर दो मन्दिरों का समूह है: परमेश्‍वर मन्दिर तथा मुक्‍तेश्‍वर मन्दिर। जैसा कि नाम से ही समझ आ रहा ये मंदिर भी शिवजी को समर्पित है। शिव जी के साथ साथ अन्य देवी देवताओं के मंदिर यहाँ पर हैं। मंदिर ना कह के इसे मंदिर समूह कह सकते हैं। इसकी संरचना भी कुछ कुछ लिंगराज मंदिर जैसी ही है। इस मंदिर में फोटो ले सकते हैं। सिद्धेश्वर मंदिर सफ़ेद रंग का बना हुआ है और पास के ही केदार गौरी मंदिर में  पहाड़ी मंदिरों की जैसी झलक नजर आई।  
अब एक नजर कुछ तस्वीरों पर-

मुक्तेश्वर मंदिर। 

मुक्तेश्वर मंदिर 
मुक्तेश्वर मंदिर 



मुक्तेश्वर मंदिर प्रवेश द्वार। 

मंदिर का अलंकरण 
सिद्धेस्वर मंदिर। 



केदार गौरी 

केदार गौरी , लग रहा है न पहाड़ी मंदिर। 

केदार गौरी 

केदार गौरी 

केदार गौरी -प्रवेश द्वार।