Thursday 19 May 2016

Jaigarh Fort,Jaipur

                  जल महल के दर्शन करने के बाद हम जयगढ़ दुर्ग जाने के लिए आगे बढ़ रहे थे, रास्ते में कई सारे हाथी पंतिबद्द हो कर वापस आते हुए दिखाई दे रहे थे जो आमेर के किले में पर्यटकों को सवारी करा के वापस आ रहे थे। ये सोच कर दुःख भी हुआ और आश्चर्य भी कि कैसे जब इतनी गर्मी में जब इंसानो का खुद का चलना मुश्किल होता है तो ये बेचारे जानवर कैसे अपने साथ इतने लोगों का भार उठा कर चलते होंगे। जल महल से इस किले की दूरी ग्यारह किलोमीटर की है। यहाँ से  जयगढ़ फोर्ट रोड  पर आगे बढ़कर हुए हम एक ऐसी जगह पर पहुंचे जहाँ से मान सिंह लेक के मध्य में विराजमान जल महल और कनक घाटी के अद्भुत दर्शन हो रहे थे।
कनक घाटी। 

जल महल। 
सुरक्षा के लिए बनाई गयी दीवार। 

             यहाँ पर कुछ समय व्यतीत के बाद हम दुर्ग की और आगे बढे। यहाँ से दुर्ग की की सुरक्षा के लिए बनाई गयी दीवार और भारत का झंडा दिखाई पड़ा। लेकिन ड्राइवर ने बताया कि ये अपने देश का तिरंगा झंडा नहीं बल्कि पांच रंग का झंडा है। किसी भी हालत में  इस बात पर विश्वास करना मुश्किल हो रहा था, तो वो बोला अब इसके समीप जा कर ही देख लेना।  उसने ये भी बताया कि ये झंडा जयपुर के राजा की महल में उपस्थिति को दर्शाने के लिए लगाया जाता है। अगर राजा जयपुर में हों तो दो झंडे लगाए जाते हैं और अगर नहीं हों तो  झंडा लगाया जाता है। आज एक ही झंडा दिख रहा था इसका तात्पर्य था कि राजा साहब शहर  में नहीं हैं। 
                 यहाँ की सड़क देख कर ये नहीं लग रहा था जैसे हम राजस्थान में हों, रास्ता तो किसी पहाड़ का जैसा ही लग रहा था क्यूंकि हम सीधी सड़क पर नही  वरन ऊँची नीची  सड़क पर चल रहे थे। आसपास में सूखे हुए पेड़ दिखाई दे रहे थे जिन्हे देख कर ऐसा आभास हो रहा था कि जब बरसात के बाद यहाँ थोड़ा हरियाली आ जाती होगी तो काफी आकर्षक दृश्य दिखाई पड़ते होंगे। अभी हरीतिमा तो नही दिख रही थी वैसे मई के महीने में ऐसी उम्मीद रखना भी गलत ही हुआ, पर जो ब्राउन ब्यूटी दिखाई दे रही थी वो भी कोई कम नहीं थी। वैसे भी राजस्थान तो अपने भूरे रंग की रेत के लिए ही प्रसिद्ध हुआ। अब तक हम फोर्ट के प्रवेश द्वार तक  पहुँच गए और यहाँ पर ड्राइवर ने बताया कि अपने और कैमरा के टिकट के साथ गाड़ी की पार्किंग का भी टिकट ले लेना तो गाड़ी ऊपर तक ही चली जाएगी। समस्त टिकट ले कर हम एक बार फिर गाड़ी में बैठ के किले की उस चोटी तक पहुँच गए जहाँ पर प्रसिद्ध तोप रखी हुयी है। इसी कारण इस किले को कैनन फोर्ट भी कहा जाता है। इस जगह से पंचरंगी  झंडा स्पष्ट नजर आ रहा था। अब हमने किले की चोटी पर बने झरोखों से ताका झांकी करना शुरू किया। इससे पहले मैंने मंगलौर में स्थित बेकाल फोर्ट और हैदराबाद का गोलकोण्डा किला देखा था, इन दोनों में मुस्लिम शासकों की छाप स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। जयगढ़ का किला राजपूतों द्वारा बना होने कारण ये इन दोनों किलों से बहुत भिन्न लगा। इसकी दीवारें मुख्य रूप गेरुआ या गुलाबी रंग लिये हुए हैं और इन दीवारों पर कई झरोखेनुमा खिड़कियां बनी हैं जो अब बाहर के दृश्य देखने के काम आती हैं , पुराने समय में इनके द्वारा किसी बाहरी आदमी के आने जाने की खबर रखी जाती होगी।
किले की दीवार पर बने झरोखे। 
                   तिरंगे के समान प्रतीत होते इस झंडे में लाल, पीला, सफ़ेद, हरा और नीला रंग है, रंगों का साम्य इस तरह से बनाया गया है कि दूर से देखने पर कोई भी इसे तिरंगा ही समझेगा। इन दीवारों पर झरोखों के अतिरिक्त दो अन्य अलग अलग आकार के छेड़ बने हुए हैं जिनमे से एक  का प्रयोग दुश्मन को छुपकर गोली मारने के लिए किया जाता था। अगर बाहरी व्यक्ति किसी प्रकार से बचकर दीवार से एकदम इस तरह से चिपक जाये कि  गोली ना लग सके तो इसका एक और उपाय था। दीवार पर कुछ छेद इस तरफ के थे जिनसे गर्म  पानी एवं गर्म तेल डालकर गिराया जा सके। वास्तव में गजब का दिमाग था इन लोगों के पास। 
ये  छेद छुपकर वार करने के लिए बनाया गया था। 
ये दो छेद गर्म पानी और गर्म तेल डालने के लिए बने थे। 
किले के झरोखों से कुछ ऐसा दिखाई दे रहा था। 

           यहाँ पर सीढ़ियों से नीचे उतर कर इधर उधर के दृश्य देखने के बाद हम यहाँ की प्रसिद्ध तोप को देखने के लिए वापस आ गए।कुछ इस तरह के  राजा जयसिंह द्वारा निर्मित होने के कारण इस किले को जयगढ़ फोर्ट और इस तोप  जयवाण  नाम दिया दिया गया था। ऐसा माना जाता है सन् सतरह सौ बीस में  बनाई गयी इस पचास कुन्तल वजन की तोप को बहुत सारे हाथियों की सहायता से हिलाया डुलाया जाता  था। यहाँ हाथियों की उपस्थिति कुछ समझ नहीं आयी, हाथी तो पानी के निकट रहने वाले जानवरों में से है।इतनी विशालकाय तोप की मारक क्षमता के विषय में कई उक्तियाँ प्रचलित हैं जिनसे एक ये है कि जब जयसिंह ने इसे परीक्षण के लिए चलाया था  तो यहाँ पर इसका गोला गिरा वहां पर एक तालाब बन गया था और एक अन्य अनुमान के आधार पर ये माना जाता है कि ये चालीस किलोमीटर की दूरी तक वार कर सकती है। इस बात में तथ्य कम अतिश्योक्ति ज्यादा नजर आती है, अगर ऐसा होता तो इसके सामने आज की बोफोर्स भी फेल हो जाती। एक बार परीक्षण के बाद इसका उपयोग कभी नही किया गया क्यूंकि उस समय काफी नुकसान हो गया था। 


अर्जुन सिंह राजपुताना कैब।  
जयवाण। 
जयवाण। 
तोप को इस तरह से सुरक्षा घेरे में रखा गया है। 
जयवाण तक जाने वाली सड़क। 
              जयवाण के दर्शन के बाद हम किले के उस हिस्से में पहुंचे जहाँ पर महाराज बैठकर जनता की पुकार सुना करते होंगे,  मतलब हम दीवाने ए आम पहुँच गए। यहाँ से आगे बढ़कर दीवाने ए खास आ गया जहाँ पर गुप्त मंत्रणाएं होती होंगी। इसके बाद एक जगह ऐसी पड़ी जहाँ पर  राजा और रानी बैठकर नर्त्य नाटिकाएं देखती रही होंगी। इसके बाद एक  भुलभुलईया से गुजरते हुए पाक शाला और राजा रानियों के खाने के स्थान पर पहुंचे। यहाँ पर राजा-रानी और खाना बनाने वाली दास-दासियों के प्रतीक रखे गए हैं। कभी  जगहों पर असली की महफ़िलें जमा करती होंगी, अन्तर ये है कि तब उन महफ़िलों को कोई देख नहीं पाता होगा।  
दीवाने ए आम। 
                    
दीवाने ए खास।  
जयगढ़ को आमेर से जोड़ने वाला  गुप्त रास्ता। 
खाना बनाने वाली दासियाँ। 
भोजन करती हुयी रानियां। 

आमेर पैलेस। 
जयगढ़ किले की जड़ पे बना हुआ तालाब। 
              यहाँ से आगे जा कर राजा के ग्रीष्मकालीन आवास में पहुंचे जिसे ललित महल के  नाम से जाना जाता है। यहाँ पर सामने से एक बगीचा है जिसमें कुछ कुछ मुग़ल शैली का प्रभाव भी झलक रहा था। गाइड के अनुसार इस जगह पर अमिताभ बच्चन द्वारा अभिनीत लाल बादशाह पिक्चर का चित्रण हुआ था। वो बता रहा था यहीं पर फांसी लगवाई  थी, अब हमने तो ये पिक्चर देखी ही नहीं तो इस बात की पुष्टि नहीं कर सकते।          
इस गार्डन में लाल बादशाह की शूटिंग हुयी थी। 
         इस जगह से आमेर के किले के दर्शन भी हो जाते हैं और सामने की लेक से ठंडी ठंडी हवा के झोखें भी आते रहते हैं। यहाँ पर मन कर रहा था काश एक दो घंटे का समय होता इस ठंडी हवा का आनंद लेने के लिए, पर कमबख्त  समय ही तो नहीं था अपने पास। प्राचीन समय में यहाँ से आमेर के किले में  एक गुप्त सुरंग थी।  अब इन रास्तों पर बिजली से जलने वाले बल्ब लगाए गए हैं  पुराने समय में इनके स्थान पर रौशनी प्रदान करने के लिए मशालें रखी जाती थी। 

आमेर पैलेस। 


इस बुर्ज पर ऐसा लग रहा था जैसे किसी ऐसी में बैठे हों।
              इसके बाद यहाँ पर स्थित संग्र्हालय का चक्कर काटा, यहाँ पर राजा रानी की पोशाक और कुछ पुरानी तस्वीरें रखी गयी हैं। यहाँ पर हम जल्दी जल्दी एक गेट से अंदर और दूसरे से बाहर हो गए। बाहर निकल कर देखा तो रेगिस्तान के जहाज मतलब ऊंट के दर्शन भी हो गए। चलो राजस्थान आ कर रेगिस्तान की रेत भले ना देखी कम से कम रेगिस्तान का जहाज तो दिख गया। इसीके साथ साथ हम जयगढ़ दुर्ग को अलविदा करते हुए आगे की राह पर बढ़ गये। 
इस यात्रा की अन्य कड़ियाँ -
इस यात्रा की अन्य कड़ियाँ -
Pink City, Jaipur
Jaigarh Fort,Jaipur
Amer Palace,Jaipur
Hava Maha and Jantar Mantar,Jaipur

13 comments:

  1. वाह शानदार जयपुर।

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  2. As usual very well written post !

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  3. बेहतरीन जयगढ़ का किला। ओर आपने बहुत सुंदर ढ़ग से लिखा।

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  4. बेहतरीन प्रस्तुति !
    हम तीन बार जयपुर हो आये मगर इस किले तक नही पहुँचे । आज आपकी वजह से ये किला भी फतह हो गया ।

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    1. बहुत बहुत बधाइयाँ किला फतह होने की

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  5. बेहतरीन प्रस्तुति !
    हम तीन बार जयपुर हो आये मगर इस किले तक नही पहुँचे । आज आपकी वजह से ये किला भी फतह हो गया ।

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  6. सुंदर
    इसमें पानी की व्यवस्था कमाल की है

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  7. सही कहूं तो किले और उनका वैभव देखकर मुझे बड़ी बेचैनी सी होने लगती है ! इतना यश , इतना गौरव , इतना भव्य , देखने में कितना अच्छा लगता है लेकिन इनके पीछे न जाने कितने गरीब भूख से तड़पे होंगे , कितने बच्चों को दो वक्त का खाना भी नसीब न हुआ होगा लेकिन किलों की साज सज्जा में कोई कमी नहीं छोड़ी जाती होगी ! ऐतिहासिक स्थलों की सैर , जयपुर के महलों की सैर हर्षिता जी बढ़िया लग रही है आपकी लेखनी और कैमरे की नजर से !!

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    1. योगीजी बिलकुल सही।

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    2. हर वैभव के पीछे एक दर्दनाक इतिहास जरूर छुपा होता है, गरीबों के बच्चे तो जरूर भूखे रहे होंगे, इसके अतिरिक्त कई और लोग भी इन सोने की चिड़िया जैसे महलों/किलों में कैद भी रहे होंगे..दर्दभरी दास्तान तो उनकी भी जरूर रही होगी .

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  8. दो बार जाने का मौका मिला है यहाँ। इन तसवीरों से जयगढ़ की पुरानी यादें ताज़ा हो गयीं।

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  9. हम तो किलो तक पहुँच ही नहीं सके ,शुक्र है तुमने दिखा दिया

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  10. garmi mei himat chahiye jaipur ghumne ke liye.

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