आज के दिन तय प्रोग्राम के अनुसार रॉस आइलैंड एवं माउंट हैरियट जाना था। पर आज जो घटना हुयी वो इस इस बात का पुख्ता उदाहरण है कि नर सोचे और नारायण करे और।अचानक ही परिवार में किसी की तबियत खराब होने से मेरे हसबैंड को अपनी फ्लाइट मोडिफाई कर के कोलकाता से होते दिल्ली जाना पड़ा यात्रा में थोड़ा व्यवधान तो पड़ा,फिर भी भगवान को धन्यवाद देना बनता था कि ये घटना ट्रिप के अंतिम दिनों में ही हुई। इसलिए हम अभी तक लगभग अपने मुख्य इंटरेस्ट की जगहें देख चुके थे। बस साथ में ले जाया हुआ बीस रूपये का नोट जो धरा का धरा रह गया उसका थोड़ा अफ़सोस था। अब यहाँ हम चार लोग ही रह गए जिनमे दो बुजुर्ग और एक छोटा बच्चा शामिल थे। अब ये लोग किसी भी हालत में छोटे बच्चे के साथ ज्यादा दूर और पानी वाली जगह में जाने को तैयार नहीं थे।इसलिए प्लान में आमूलचूल परिवर्तन करते हुए लोकल पोर्ट ब्लेयर देखने का मन बनाया गया। वैसे अब तक यहाँ के मुख्य आकर्षण जॉली बॉय आइलैंड,कोर्बिन्स कोव बीच ,सेलुलर जेल एवं म्यूज़ियम इत्यादि हम पहले ही देख चुके थे। अब यहाँ के दर्शनीय स्थलों में से हमारी देखने वाली जगहों में जॉगर्स पार्क ,गांधी पार्क और राजीव गांधी वाटर पार्क और चाथम सौ(आरा मिल) मिल बचे थे ,जिसमे राजीव गांधी पार्क में वाटर स्पोर्ट्स का आयोजन होता है, तो हमारा वहां जाने का कोई खास मन नहीं था।इसलिए आज के दिन की शुरुआत भले मॉर्निंग वाक के साथ नहीं हुई पर फिर भी जॉगर्स पार्क से ही हुई।
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जॉगर्स पार्क का एक दृश्य |
अब देखते हैं क्या खास है जॉगर्स पार्क में
जैसा कि नाम से ही पता लग रहा है वीआईपी रोड पर स्थित जॉगर्स पार्क सुबह और शाम वाक और जोगिंग करने वालों की भीड़ से भरा हुआ रहता है। जब काफी देर समुद्र की लहरों के साथ मस्ती करने के बाद जब कदम थकान से डगमगाने लगें तो चार पल शांतिपूर्ण वातावरण में बैठने के लिए इससे पार्क से बेहतर कोई जगह नहीं हो सकती है। ये जगह पोर्ट ब्लेयर की ऊँची जगहों में से एक है,जहाँ से शहर के नयनाभिराम दृश्य देखे जा सकते हैं। इस स्थान की सबसे बड़ी विशिष्टता इसका वीर सावरकर हवाई अड्डे से मात्र एक किलोमीटर की दूरी पर होना है। यहाँ आराम से शांतिपूर्ण वातावरण में बैठकर वायुयानों को उड़ते और लैंड होते हुए देख सकते हैं। ये पार्क सुबह साढ़े पांच बजे से रात्रि के आठ बजे तक खुला रहता है। सबसे मजेदार बात ये है क़ि यहाँ जाने की कोई फीस नहीं पड़ती। यहाँ पर खड़े हो के रनवे तो रनवे,आने जाने वाले वायुयानों की हर गतिविधि पर नजर रखी जा सकती है,हालाँकि हम इतने खुशकिस्मत नहीं थे कि उड़ता या लैंड होता जहाज देख पायें, क्यूंकि यहाँ गिनी चुनी फ्लाइट्स आती हैं। सुबह आने वाली वाली आ के चली गयी और दूसरी के आने में अभी काफी वक्त था। कड़ी धूप में ज्यादा देर रुका नहीं जा रहा था। इसलिए सामने दिखने वाले रनवे का ही फोटो लेने का सोचा। इतने में जेब से कैमरा निकला तो पता लगा उसका मेमोरी कार्ड गायब है और एक बार फिर कई साल पुराने मोबाइल के कैमरा ने साथ दिया। उसका रिजल्ट आपके सामने है।
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जॉगर्स पार्क से दिखता वीर सावरकर एयरपोर्ट का एक मात्र रनवे |
कुछ देर यहाँ बिताने के बाद हम अब गांधी पार्क की और जा रहे थे तभी रास्ते में भारत के नक़्शे की तरफ नजर पड गयी। जो जगह देश प्रेम के मतवालों की हो वहां भारत के नक़्शे का होना तो आवश्यक ही है।
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मेरा भारत महान |
इसके बाद हम गांधी पार्क के मुख्य द्वार पर पहुँच ही गए।अंडमान के लिहाज से गांधी पार्क एक अच्छी जगह है ,पर भारत के अन्य हिस्सों से आने वालों को उतनी खास नहीं लगेगी। अब जैसे कोई बैंगलोर से जाये जो कि खुद ही गार्डन सिटी के नाम से फेमस है ,तो उसके मन में ये पार्क रच बस नहीं पायेगा। परन्तु बच्चों के साथ आने वाले पर्यटकों के लिए ये एक ठीकठाक जगह है ,बच्चों के लिए काफी कुछ है यहाँ पर।नाम के अनुरूप यहाँ गांधी जी की एक प्रतिमा लगी हुयी है।उसके अतिरिक्त एक बच्चों की खिलौना ट्रैन है। खिलौना ट्रैन वाले और मेरे बीच के वार्तालाप की एक झलक -"कितने पैसे लगेंगे भईया ,जी अस्सी रूपये ,अब पता नहीं बच्चा बैठेगा या नहीं ,मैडम बच्चा आपका है आपको पता होगा कि बच्चा बैठेगा या नहीं। " वैसे मेरा मन ये था एक बार बैठा के देख लेते ,अगर ठीक लगता तो पैसे दे देते। पर जब उसके गरम अंदाज देखे तो हम वहां से ट्रैन का मोह छोड़ के निकल लिए। यहाँ पर एक छोटी सी क्रतिम झील भी है जो शायद बच्चों को बोटिंग करने के लिए इस्तेमाल होती हो। इसके अलावा एक बड़ी झील है जिसके चारों और ये पार्क बना हुआ है। पहले हमारा विचार पूरे पार्क का एक चक्कर लगाने का था ,पर जब थोड़ा दूर जा के ऐसा लगा कि सब जगह से लगभग एक ही तरह के दृश्य दिखाई दे रहे हैं ,तो हम वहीँ से वापस हो लिए।इस लेक में पैडल बोट की सुविधा भी उपलब्ध है। हमने कई जगह बोटिंग करी है तो इस छोटी सी झील में बोटिंग का कोई इरादा नहीं था। इस पार्क के कुछ दृश्य -
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खिलौना ट्रैन गूगल द्वारा |
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लेक में खड़ी पैडल बोट |
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लेक के किनारे किनारे चलने के लिए बना पैदल पथ |
अंडमान आइलैंड का बाजार मोती और कोरल के लिए काफी प्रसिद्ध माना जाता है। कहते हैं कि यहाँ पर सच्चा मोती कम दामों में मिल जाता है। इसलिए हम भी चले गए सच्चा मोती खरीदने ,अब हम तो ठहरे ग्राहक ,क्या जाने कौन सा मोती सच्चा है और कौन सा झूठा। फिर भी इससे पहले मैंने नवाबी नगरी हैदराबाद से मोती खरीदे थे। वहां का अनुभव थोड़ा काम आया,वहां किसी ने कहा था मोती को रगड़ के देखना चाहिए और खरोच आने के बाद पानी लगा के देखो फिर पहले जैसा दिखने लगे तो सच्चा माना जाता है ,सो यही फार्मूला आजमा के कर ली थोड़ा खरीददारी। यहाँ से बाहर निकलने तक रात ही हो गयी थी ,तो सोचा एक बार फिर से भारत के नक़्शे के दर्शन करते हुए ही होटल वापस जाएँ।
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जगमगाता हुआ भारत का नक्शा |
यहाँ से होटल वापस जा के एक बार फिर चौखट के भोजन का जमकर आनंद उठाया ,और अपना सारा सामान कर जल्दी ही सो गए। अगला दिन अंडमान को अलविदा कह कर वाया चेन्नई शताब्दी एक्सप्रेस से बैंगलोर पहुँचने के लिए निर्धारित था। इसी के साथ सफेद रेत अंडमान आइलैंड की अविस्मरणीय यात्रा का सुखद समापन हो गया।
अंडमान का सफर एक नजर में -